उसूले दीन

सबक़ १५: ज़रूरते अम्बिया

इन्सान की ख़िल्क़त किस लिए?

आया ख़ुदावंद आलम ने इन्सान को इस लिए पैदा किया कि इस दुनिया के तवालुद-ओ-तनासुल (ज़ाद-ओ-वलद) में उस की हैसियत मशीन के एक पुर्ज़े की तरह़ हो। और इन्सान मशीनी और सऩअती इन्सान कहलाए?

आया इन्सान की ख़िल्क़त सिर्फ़ ऐश-ओ-इशरत के लिए है?

या इन्सान इस लिए पैदा किया गया है कि ज़मीन में पोशीदा ज़ख़ीरों का पता चलाए और अपनी दौलत-ओ-सर्वत में बराबर एज़ाफ़ा करता रहे। इन्सानी ख़ाहिशात के चिराग़ की लौ और बढा दे?

हाँ  इस के अलावा कोई और नज़रिया पेशे नज़र नहीं है?

बहुत से लोग ऐसे हैं जो इन्सान की ह़क़ीक़त से नावाक़िफ़ और उस की अज़्मत-ओ-मंज़ेलत से बेबहरा हैं। उन लोगों ने इन्सान के सिर्फ़ माद्दी पह्लू पर नज़र रखी है और इस अज़ीम सिक्के के दूसरे रु़ख से बिल्कुल ग़ाफ़िल हैं।

लेकिन वोह लोग जो इन्सान शनास हैं उन का कहना है कि इन्सानी ज़िंदगी के तीन पह्लू हैंः

(१) माद्दी और शख़्‌सी (निजी) ज़िंदगी

(२) इज्तेमा़ई ज़िंदगी

(३) दुनियाए रू़ह-ओ-ह़क़ीक़त

वोह लोग जो सिर्फ़ पहले पह्लू पर नज़र जमाए रहे वोह इन्सान के लिए बे क़ैद-ओ-शर्त आज़ादी के क़ाएल हो गए ख़ाह ऐसी आज़ादी इन्सान के लिए नुक्सानदेह साबित क्यों न हो। येह लोग इन्सान की ह़क़ीक़त से नावाक़िफ़ हैं और दूसरे दो अहम पह्लूओं से बिल्कुल ग़ाफ़िल हैं।

वोह लोग जिन्होंने सिर्फ़ पहले और दूसरे पह्लू को नज़र में रखा और तीसरे पह्लू को नज़रअंदाज कर दिया येह लोग इन्सान के लिए एक ऐसे समाज की तश्कील देते हैं जिसमें अख़्लाक़ी और इन्सानी सिफ़ात की कोई जगह नहीं है।

समाजियात के माहिर ‘ट्‌वीन बी’ ने मुजल्ला लाइफ़ (थ्घ्इिं) के ख़बर निगार को एक इंटरव्यू देते हुए कहा थाः

‘हमने अपने को माद्दियात के सिपुर्द कर दिया है और इस तरह़ हम माद्दी ज़रूरीयात से बेनियाज़ हो गए हैं लेकिन अख़्लाक़ी ले़हाज़ से हम बिल्कुल फ़क़ीर और मोहताज हैं। और मेरा अक़ीदा तो येह है कि अभी ग़नीमत है कि हम ग़लत रास्ते को छो़डकर सही़ह राह इख़्तेयार कर लें और मज़हब के पाबंद हो जाएँ’ ……. (माहनामा ‘मसाएले ईरान’ दी माह)

मुहवि़क़क़ीन और आक़ेबत अंदेश हज़रात ने इन्सान के दोनों पह्लूओं को नज़र में रखते हुए क़दम आगे बढ़ाया और इन्सान के तीनों पह्लूओं पर नज़र डाली और इस की ग़र्ज़े ख़िल्क़त का मुतालआ किया तो सही़ह तौर से इन्सान की मअ्‌रेफ़त ह़ासिल की और अगर तीनों पह्लूओं को नज़र में रखे बगैर इन्सान की मअ्‌रेफ़त ह़ासिल की जाए तो वोह मअ्‌रेफ़त नातमाम और नाक़िस होगी। इस के अलावा अगर तीसरे पह्लू को मद्दे नज़र रखा जाए तो उस वव़त इन्सान में इतनी सलाह़ियत और इस्तेअ्‌दाद नमूदार होती है जो ज़िंदगी के हर मैदान में उस को क़ूवत बख़्शती है, ख़ाह इन्फ़ेरादी ज़िंदगी हो ख़ाह इज्तेमा़ई, ज़िंदगी के मसाएल समझने और सुलझाने का तरीक़ा सिखाती है। सही़ह नुक़्तए नज़र भी यही है। इन्सान को चाहिए कि वोह कमाल के हर पह्लू पर नज़र रखे और उनको ह़ासिल करने की कोशिश करे क्योंकि ख़िल्क़त कमालात के हुसूल के लिए हुई है। इस बयान के बअ्‌द येह सवाल बिल्कुल मुनासिब हैः क्या इन्सान की फ़ितरत और उस का ज़मीर ज़िंदगी के तीनों पह्लूओं में उस की राहनुमाई कर सकता है?

सवाल के लिए ज़रा एक तफ़सीली जाएज़ा लेते हैंः

फ़ितरत और ज़मीर

बअ्‌ज़ माहेरीने ऩपसीयात ने ‘ज़मीर’ के वजूद से इन्कार किया है उनका कहना है कि हम जिसे ज़मीर और फ़ितरत के नाम से याद करते हैं वोह उस तरबियत और समाज का असर है जिसमें बच्चे ने ज़िंदगी गुज़ारी है वर्ना ज़मीर कोई मुस्तक़िल चीज़ हो, ऐसी कोई बात नहीं है

जब कि माहेरीने ऩपसीयात की कसीर तअ्‌दाद इस बात की मोअ्‌तक़िद और मोअ्‌तरिफ़ है कि इन्सानी वजूद की गहराइयों में एक ह़क़ीक़त मौजूद है जिसमें येह सलाह़ियत है कि वोह अच्छाइयों और बुराइयों को तश़्खीस दे सके। वोह बच्चे जो अभी मा़हौल और समाज के हमरंग नहीं हुए हैं उनकी फ़ितरत और ज़मीर में भी कोई इऩ्हेराफ़ नहीं है। वोह बहुत अच्छी तरह़ अच्छाइयों और बुराइयों, नेकी और बदी की ह़क़ीक़त से वाक़िफ़ हैं। येह वोह ह़क़ीक़त है जो इन्सान की सा़ख्ता और पर्दा़ख्ता नहीं।

येह बात ज़रूर है कि बअ्‌ज़ अच्छाइयाँ और बुराइयाँ रस्म-ओ-रवाज की ताबे़अ्‌ हैं जैसे बअ्‌ज़ मख़्सूस लेबास और बअ्‌ज़ मख़्सूस ग़ेज़ाएँ। एक जगह अच्छी ख़याल की जाती हैं और दूसरे मा़हौल में ह़ेक़ारत की निगाह से देखी जाती हैं। लेकिन जिस शख़्स के पास थोड़ी बहुत अक़्ल है और एनाने फ़िक्र अक़्ल के हाथों में है वोह तमाम ख़ूबियों और बुराइयों के सिलसिले में येह फ़ैसला नहीं कर सकता कि सब की सब आदात-ओ-रुसूम की पाबंद हैं। उसे इस ह़क़ीक़त का यक़ीन है कि अमानत, अद्‌ल-ओ-इन्साफ़, वफ़ादारी, ज़ईफ़ों की मदद, ख़िदमते ख़ल्क़, बरादरी और बराबरी….. इनका तअल्लुक़ इन्सान के वजूद की गहराइयों से है। येह वोह चीज़ें हैं जो हर वक़्त और हर जगह क़ाबिले सताइश हैं। इस के बर ख़ेलाफ़ ज़ुल्म-ओ-सितम, ख़ेयानत, बेवफ़ाई, ख़ुदपसंदी येह वोह चीज़ें हैं जो हर मा़हौल और हर समाज में क़ाबिले लअ्‌नत-ओ-मलामत हैं। इन तमाम चीज़ों की अच्छाई और बुराई कोई मस्नूई नहीं है।

लेहाज़ा हमें इस बात का एअ्‌तेराफ़ करना प़डेगा इन्सान के वजूद की गहराइयों में एक ह़क़ीक़त ज़रूर मौजूद है जिसे फ़ितरत और ज़मीर के नाम से याद करते हैं। लेकिन इस ह़क़ीक़त की तरफ़ भी तवज्जोह करना ज़रूरी है।

ज़मीर तन्हा इस बात पर क़ादिर नहीं है कि वोह ज़िंदगी के तमाम शोअ्‌बों में इन्सान की राहनुमाई करे और ज़िंदगी के हर मोड़ पर हेदायत करे। क्योंकि ज़मीर और फ़ितरत दोनों ही को तअ्‌लीम-ओ-तर्बियत की ज़रूरत है। क्योंकि ज़मीर उस मअ्‌देन की तरह़ है जो पहाड़ के दामन में पोशीदा है। ज़रूरत है कि उस को तलाश किया जाए और उस को पाक-ओ-साफ़ किया जाए ताकि इस्तेअ्‌माल के क़ाबिल हो सके और कुन्दन बन सके। ज़मीर और फ़ितरत बसा-औक़ात मा़हौल और समाज के रंग में रंग जाते हैं और अपनी अस्ली और सही़ह राह से मुऩ्हरिफ़ हो जाते हैं और उनका वजूद इस क़द्र बेनूर हो जाता है कि बअ्‌ज़ माहेरीने ऩपसीयात भी उन के वजूद से इन्कार कर बैठते हैं।

लेहाज़ा एक सआदतमंद और पुर इ़पते़खार ज़िंदगी के लिए एक मअ्‌सूम रहबर की ज़रूरत है जो हर शोअ्‌बए ह़यात में इन्सान की राहनुमाई और हेदायत कर सके।

बशरी नज़रियात

जनाब ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश से हज़ारों साल पहले से आज तक इन्सान ने इज्तेमा़ई और इन्फ़ेरादी इस्ला़ह के लिए मु़ख्तलिफ़ नज़रियात पेश किए हैं लेकिन चूँकि इन्सान की मअ्‌लूमात नेहायत मह्दूद है सआदत और कमाल के तमाम पह्लूओं पर उस की नज़र नहीं है इन्सान अख़्लाक़ी और माद्दी पह्लूओं से बतौर कामिल आश्ना नहीं है। इस बेना पर इन्सान कभी इस बात पर क़ादिर न हो सका कि वोह कोई ऐसा नज़रिया पेश कर सके जो इन्सान के तमाम फ़ितरी तक़ाज़ों का भरपूर जवाब हो।

डाक्टर ‘ब्रोज़’ का कहना है कि मैंने चंद साल क़ब्ल ‘आइंस्टाइन’ को कहते हुए सुनाः

‘इल्म हमें उन चीज़ों से आगाह करता है जो हैं लेकिन दीन (व़ह्य) हमें उन चीज़ों से आगाह करता है जिन्हें ‘होना चाहिए ’

(किताब फ़ाएदा व लुज़ूमे दीन स॰ ५ नक़्ल अज़ सेक़ातुल इस्लामीया, मक़ाला डॉक्टर पुलुर बुरोज़, ज़ेने उनवान इस्लाम में राबेतए इल्मे दीन)

वेक्टर हेगो का कहना है इन्सान जितनी ज़्यादा तरक़्क़ी करता जाएगा उसी एअ्‌तबार से दीन की ज़रूरत ज़्यादा होती जाएगी।

(किताब साबिक़, स॰ ५, नक़्ल अज़ आईने सु़खुन्वरी, जि॰ २, तालीफ़-ओ-तर्जुमा ज़काउल मुल्क फ़रोगी)

इस के अलावा अफकार-ओ-नज़रियात की राह में एक अहम एअ्‌तराज़ येह है कि अगर येह बात तस्लीम कर ली जाए कि इन्सानी अक़्ल ने जिन नज़रियात का इ़ज्हार किया है कि वोह सद दर सद (सौ फ़ीसद) सही़ह और कामिल हैं। लेकिन इन्सानी नज़रियात के पास कोई नेफ़ाज़ी ज़मानत नहीं है क्योंकि बहुत से लोगों के लिए येह बात इल्म और तजरेबा के ज़रीए साबित हो चुकी है कि शराब, जुआ, चोरी, जुर्म येह तमाम चीज़ें समाज के लिए किस क़द्र मुज़िर और नुक्सानदेह हैं लेकिन इस के बावजूद येह हज़रात इस में गिरफतार हैं और इस को छोड़ने पर तैयार नहीं हैं।

इस ह़क़ीक़त से सब अच्छी तरह़ वाक़िफ़ हैं कि वोह ‘अक़वामे मुत्त़हेदा जिसके दुनिया के अक्सर-ओ-बेश्तर मुमालिक मेम्बर हैं। दुनिया का येह अज़ीम तरीन इदारा इस क़द्र मजबूर और नातवाँ है कि उस के अक्सर दस्तूरात-ओ-क़वानीन सिर्फ़ काग़ज़ की हुदूद तक मह्दूद रह जाते हैं और इस के आगे दुनियाए अमल में क़दम नहीं रखते हैं। इस की वजह सिर्फ़ येह है कि इन्सानी अफकार-ओ-नज़रियात के पास कोई ‘नेफ़ाज़ी ज़मानत’ नहीं है वोह अफकार-ओ-नज़रियात को क़बूल कर लेता है लेकिन ख़ुद ही उन पर कारबन्द नहीं रहता है।

लेकिन आसमानी क़वानीन जिसका सरचश्मा इल्मे ख़ुदावंदी है जो लामह्दूद है जहाँ इश्तेबाह और ख़ता का गुमान तक नहीं है और उस की मंज़िल पैग़म्बरों का क़ल्बे मुतह्‌हर है लेहाज़ा आसमानी क़वानीन के असरात कहीं ज़्यादा हैं।

इस के अलावा हर फ़ेअ्‌ल के अंजाम या तर्क पर जज़ा और सज़ा मु़अय्यन की गई है। येह चीज़ आसमानी क़वानीन को और ज़्यादा अमली बना देती है। अक़्ल और फ़िक्र तन्हा कोई ‘नेफ़ाज़ी ज़मानत’ नहीं रखते बल्कि ज़रूरी है कि जिस चीज़ को इन्सानी अक़्ल ने तश़्खीस किया है ग़ैब से उस की ताईद और तौसीक़-ओ-तस्दीक़ हो ताकि वोह अमली हो सके।

यहाँ तक येह बात बाक़ा़एदा रोशन हो गई की फ़ितरत, ज़मीर और बशरी नज़रियात तन्हा इन्सान के लिए सआदत की राहें मु़अय्यन नहीं कर सकते हैं और न बतौरे कामिल उस की राहनुमाई कर सकते हैं। हाँ इन तमाम चीज़ों में येह सलाह़ियत पाई जाती है कि पैग़म्बरों की नजात बख़्श गुफतार और आसमानी क़वानीन के ज़रीए उनकी सही़ह तरबियत की जाए ताकि येह चीज़ें मुऩ्हरिफ़ और बे राह रवी का शिकार न होने पाएँ और इन्सान को नेकी और कामियाबी के साह़िल से हमकनार कर दें।

ह़ज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के पहले ख़ुतबा में अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की ग़र्ज़े बे़अ्‌सत बयान करते हुए फ़रमाते हैंः

‘ख़ुदावंद आलम ने पैग़म्बरों को इस लिए भेजा ताकि वोह फ़रामोश शुदा ने़अ्‌मतों को याद दिलाएँ और अक़्ल-ओ-फ़िक्र के पोशीदा ख़ज़ानों को उभारें और सही़ह राह पर लगाएँ।’

अगर येह बात तस्लीम भी कर ली जाए कि तमाम इन्सानी अफकार-ओ-नज़रियात सही़ह हैं तो क्या क़ुदरतमंद और सा़हेबाने सर्वत-ओ-इक़्तेदार इस बात की इजाज़त दें कि ह़क़ को बातिल से जुदा किया जा सके और उस की मअ्‌रेफ़त ह़ासिल की जा सके बल्कि येह सा़हेबाने सर्वत-ओ-इक़्तेदार अपने इक़्तेदार और तमाम दूसरी कोशिशों से ह़क़ के ह़क़ीक़ी चेहरे को छिपा देंगे ताकि लोग सही़ह और ग़लत के दरमियान तमीज़ न दे सकें और ह़क़ को क़बूल न कर सकें।

इसके बर ख़ेलाफ़ वोह क़वानीन जो ख़ुदाई हैं लोग मोअ्‌जेज़ात और दूसरी निशानियों के ज़रीए उनकी सच्चाई को परख सकते हैं कि ख़ुदावंद आलम ने उन क़वानीन को पैग़म्बरों के ज़रीए हम तक भेजा है। उन पर ईमान लाना और उन पर अमल करना ज़रूरी है। इस तरह़ से उन तमाम लोगों पर भी हुज्जते ख़ुदा तमाम हो जाती है जो उस के आईन की मुख़ालेफ़त करते हैं ताकि क़यामत के दिन उनके लिए कोई बहाना बाक़ी न रहे और येह न कह सकें कि हमारे पास कोई ज़रीआ ही न था जिसके ज़रीए हम दीने इलाही की मअ्‌रेफ़त ह़ासिल कर सकते।

ज़रूरते बे़अ्‌सत

चूँकिः

(१)  ज़िंदगी के हर शोअ्‌बे में कमाल की इरतेक़ाई मंज़िल तै करना ग़र्ज़े ख़िल्क़त है।

(२)  तन्हा फ़ितरत और ज़मीर उसे कमाल की आख़िरी मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकते हैं।

(३)  बशरी नज़रियात भी तमाम फ़ितरी तक़ाज़ों का सही़ह जवाब देने से क़ासिर हैं। इस के अलावा उनके पास कोई ‘नेफ़ाज़ी ज़मानत’ भी नहीं है।

(४)  अम्बिया (अ.स.)का आना और मोअ्‌जेज़ात के ज़रीए उनकी नबूवत का साबित होना और हर एक के लिए ह़क़ और बातिल का जुदा हो जाना जिसके बअ्‌द कोई बहाना बाक़ी न रहे ताकि ह़क़ की अदमे मअ्‌रेफ़त का उज़्र पेश न किया जा सके।

अब येह बात रोशन हो जाती है कि कमाल की इरतेक़ाई मंज़िल तै करने के लिए अम्बिया अलैहिमुस्सलाम का आना ज़रूरी और लाज़िमी है। अम्बिया की ग़र्ज़े बे़अ्‌सत यही है कि वोह इस इरतेक़ाई सफ़र में इन्सान को उन तमाम बातों की तरफ़ मुतवज्जेह करें जो ज़रूरी हैं और जिनकी उन्हें ज़रूरत है ताकि सआदते ह़क़ीक़ी की राह में क़दम उठाएँ। येह तसव्वुर बिल्कुल ग़लत है कि ख़ुदावंद ह़कीम अपनी मख़्लूक़ात को बगैर किसी दस्तूरे ह़यात के छो़ड दे या वोह अपनी मख़्लूक़ात को क़ुदरत मंदों के हवाले कर दे ताकि येह लोग इन्सान को अपने नाजाएज़ मक़ासिद के लिए इस्तेअ्‌माल करें और उसे उस के इरतेक़ाई सफ़र से बाज़ रखें।

अज़ीम फ़लसफ़ी बू़अली सेना अपनी किताब ‘शिफ़ा’ में तहरीर फ़रमाते हैंः

‘इन्सान की बक़ा और हुसूले कमाल के लिए अम्बिया की बे़अ्‌सत पलक और अबरू के ऊपर बाल उगने से और तलवे की गहराई (जिस के बगैर इंसान सही़ह तौर से ख़डा नहीं हो सकता है) से कहीं ज़्यादा ज़रूरी और लाज़िमी है।

(किताब शेफ़ा बहस इलाहियात फ़स्ल नबूवत)

ग़र्ज़े ख़िल्क़त के हुसूल के लिए माद्दी और मअ्‌नवी मंज़िल में कमाल ह़ासिल करने के लिए ज़रूरी है कि ख़ुदावंद आलम अम्बिया अलैहिमुस्सलाम को भेजे ताकि मशअले व़ही के ज़रीए बशरीयत की हेदायत करें।

 

हेशाम इब्ने ह़कम का बयान हैः

एक शख़्स (जो ख़ुदा पर ईमान नहीं रखता था) ने ह़ज़रत इमाम जअ्‌फ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से सवाल किया कि आपने ज़रूरते बे़अ्‌सत और अम्बिया अलैहिमुस्सलाम को कहाँ से साबित किया है? और इस की दलील क्या है?

इमाम अलैहिस्सलाम ने इर्शाद फ़रमायाः

‘जब हम येह बात साबित कर चुके हैं कि हमको एक ज़ात ने पैदा किया है जिसमें मख़्लूक़ात की कोई सिफ़त नहीं पाई जाती है वोह ह़कीम है और हर चीज़ से बलंद-ओ-बाला है। लोग न तो उस को देख सकते हैं और न उस को मस कर सकते हैं ताकि उस से बह्स-ओ-गु़पतगू करें और अपने अहकाम उस से दरिया़पत करें। लेहाज़ा ज़रूरी है कि लोगों के दरमियान उस के नुमाइंदे हों ताकि उस के और मख़्लूक़ात के दरमियान वास्ता और राब्ता हो।

लोगों को उनके सूद-ओ-ज़ियाँ (नफ़़अ्‌-ओ-नुक़सान) से आगाह करें और उनकी बक़ा और फ़ना जिस चीज़ से मर्बूत है उस की तरफ़ उन्हें मुतवज्जेह करें और बताएँ कि कौन से काम उन्हें अंजाम देना है और किस चीज़ से परहेज़ करना है। पस ऐसे अफराद का वजूद ज़रूरी है जो लोगों के दरमियान अम्र-ओ-नही के फ़रीज़े को अंजाम दें।

ख़ालिक़ और मख़्लूक़ के दरमियान वास्ता हों येह मुक़द्दस हस्तियाँ अम्बिया अलैहिमुस्सलाम हैं जो ख़ुदावंद आलम के बर्गुज़ीदा बंदे हैं जिन्हें ख़ुदा ने अदब-ओ-ह़िक्मत के ज़ेवर से आरास्ता किया और उन्हें मब्‌ऊस फ़रमाया है। अम्बिया और पैग़म्बर गरचे शक्ल-ओ-सूरत के ले़हाज़ से तमाम लोगों से मु़ख्तलिफ़ नहीं हैं लेकिन रू़ही और मअ्‌नवी सिफ़ात में कोई एक भी उनका शरीक नहीं है। ख़ुदावंद आलम ने उन्हें इल्म-ओ-ह़िक्मत के ज़रीए अम्बिया और पैग़म्बरों की शेना़ख्त और उनके दअ्‌वा की सदाक़त के लिए दलीलें मु़अय्यन की और उनको मोअ्‌जेज़ात अता फ़रमाए ताकि ज़मीन हुज्जते ह़क़ से ख़ाली न रहे।

(उसूले काफ़ी जि॰ १, स॰ १६८,  तबअ्‌ आ़खवंदी)

आसमानी क़वानीन किसी ख़ास महवर पर गर्दिश नहीं करते हैं बल्कि ज़िंदगी के तमाम शोअ्‌बों पर उनकी गिऱपत है।

हुकूमत, अदालत, इक़्तेसाद, ह़िकमत, पाकीज़गी, शराफ़त, बरादरी, बराबरी, हेदायत, तरबियत, इल्म-ओ-दानिश, क़ुदरत-ओ-ताक़त, इन्फ़ेरादी और इज्तेमा़ई वज़ाएफ़, एबादत, ….. और वोह उमूमी क़वानीन जो अपने दामन में जु़ज्ईयात लिए हुए हैं, येह तमाम की तमाम चीज़ें एक आसमानी देन का मक़सद और ह़दफ़ हैं और इस तरह़ से इन्सान की परवरिश और तरबियत की जाती है कि वोह ज़िंदगी के तीनों पह्लूओं में बाक़ा़एदा कमाल ह़ासिल करे और अपने इरतेक़ाई सफ़र को सआदत मंदी और कामियाबी के साथ कर सके।

आसमानी अदियान ने किसी ख़ास तबके को मूरिदे नज़र (क़ाबिले तवज्जोह) क़रार नहीं दिया बल्कि तमाम तबक़ात पर निगाह रखी है और तमाम इन्सानों के हुक़ूक़ बयान किए हैं। पस वोह लोग जो येह ख़याल करते हैं कि दीन और मज़हब हुक्मराँ और सर्वत मंद तबक़ों की पैदावार है या उसे ज़मींदारों और सरमायादारों ने अपने ज़ाती मफ़ाद की ह़ेफ़ाज़त के लिए वजूद दिया है और उसे ग़ढा है, ऐसा ख़याल करने वाले दीन के मतालिब-ओ-मक़ासिद से नावाक़िफ़ हैं। तारीख के सफ़़हात इस ह़क़ीक़त पर गवाह हैं कि जब मुर्सले अअ्‌ज़म (स.अ.) ने दीन की तब्लीग़ शुरू़अ्‌ की तो उस में सरमायादारों का कोई हाथ न था और न उनकी पुश्तपनाही ह़ासिल थी बल्कि दीन ने हमेशा सरमायादारों और ज़मींदारों के सितम-ओ-ज़ुल्म के ख़ेलाफ़ आवाज़े इन्क़ेलाब बलंद की और उनसे सरे मैदान जंग की।

हुक्मराँ, उलमा-ओ-दानिशमंद, देहाती-ओ-शह्री, तेहीदस्त और आसूदा ह़ाल…. ने सिर्फ़ इस लिए दीन इस्लाम क़बूल किया कि उनके तमाम फ़ितरी तक़ाज़ों का जवाब सिर्फ़ इस्लाम के दामन में मौजूद था। तन्हा दीन में येह सिफ़त पाई जाती है कि वोह तमाम अफरादे बशर को कमाल की राह पर गामज़न करे और इस इरतेक़ाई सफ़र में हर क़दम पर उनकी रहनुमाई करता रहे ख़ुश क़िस्मती से आजकल उलमा-ओ-दानिशमंद हज़रात दीन की अज़्मत और अहम्मीयत के क़ाएल हो रहे हैं और इस ह़क़ीक़त के मोअ्‌तरिफ़ हैं कि ह़क़ीक़ी अम्न-ओ-अमान इत्मीनान बख़्श और आसूदा ज़िंदगी सिर्फ़ दीन और ईमान के साया में मुयस्सर है बस।

ज़रूरते मोअ्‌जेज़ा

जब येह बात बाक़ा़एदा रोशन हो गई कि सआदते कामिल के हुसूल के लिए पैग़म्बरों और अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की रहनुमाई की सख्त ज़रूरत और एहतेयाज है और सिर्फ़ उन्हीं की तअ्‌लीमात के साए में सआदतमंद ज़िंदगी की तअ्‌मीर हो सकती है और उन्ही की डाली हुई बुनियाद पर मंज़िले इरतेक़ा की तअ्‌मीर की जा सकती है जिसकी बुनियाद पर इन्सान अपने दिल की गहराइयों में अम्बिया अलैहिमुस्सलाम से एक ख़ास अक़ीदत, ख़ुलूस और मोहब्बत महसूस करता है।

येह अक़ीदत और ख़ुलूस इस हद तक पहुँच जाता है कि लोग तअ्‌लीमाते अम्बिया की तब्लीग़ और नश्र-ओ-इशा़अत की राह में किसी भी क़ुर्बानी से दरे़ग नहीं करते बल्कि अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की फ़रमाइशात को अपनी ख़ाहिशात पर मुक़द्दम रखते और उनके अहकाम की एताअत करते हुए अपनी ख़ाहिशात का गला घोंट देते हैं।

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम से येह अक़ीदत, ख़ुलूस और दिल की गहराइयों से उनके अहकाम नाफ़िज़ करना येह सब चीज़ें बअ्‌ज़ जाह तलब और इक़्तेदार परस्त की निगाहों में खटकीं और वोह इस फ़िक्र में पड़ गए कि किस तरह़ से इस अक़ीदत और ख़ुलूस से ग़लत फ़ाएदा उठाया जाए ताकि अपनी ख़ाहिशात पूरी की जाएँ।

लेहाज़ा अगर किसी ने नबूवत का दअ्‌वा किया और कुछ लोग उस के गिर्द जमअ्‌ भी हो गए तो हमें बगैर सोचे समझे उस का मोअ्‌तक़िद नहीं हो जाना चाहिए और बगैर तहक़ीक़ के उस का कलेमा नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि येह शख़्स अपने दअ्‌वे में झूठा हो और उसने ग़लत और बेबुनियाद दअ्‌वा किया हो। क्योंकि अब तक मुतअद्दिद अफराद नबूवत का दअ्‌वा भी कर चुके हैं और अक्सर उनके मोअ्‌तक़िद भी हो गए थे।

दअ्‌वाए नबूवत की सदाक़त और हक़्कानियत दरिया़पत करने के लिए ज़रूरी है कि पैग़म्बर अपने दअ्‌वाए नबूवत के सुबूत में कोई ऐसी मुस्त़हकम दलील पेश करे जिससे सब को इत्मीनान और यक़ीन ह़ासिल हो जाए ताकि इस तरह़ सच्चे और बरहक़ नबी और जअ्‌ली पैग़म्बरों के दरमियान इम्तेयाज़ किया जा सके और एक को दूसरे से जुदा किया जा सके।

वोह दलील और वोह निशानी जिसके ज़रीए अम्बियाए बरहक़ की मअ्‌रेफ़त ह़ासिल की जाती है उस को मोअ्‌जेज़ा कहा जाता है। मख़्लूक़ात को इश्तेबाह और जअ्‌ल साज़ों से महफ़ूज़ रखने के लिए ख़ुदावंद आलम ने अम्बिया अलैहिमुस्सलाम को मोअ्‌जेज़ात अता फ़रमाए हैं ताकि नबीये बरहक़ की मअ्‌रेफ़त में कोई कसर न रह जाए और हक़्कानियत बाक़ा़एदा आश्कार हो जाए।

यहाँ तक हम येह बात समझ चुके कि अम्बिया अलैहिमुस्सलाम का साहेबे मोअ्‌जेज़ा होना नेहायत ज़रूरी और लाज़िमी है ताकि लोगों को इस बात का यक़ीन हो जाए कि येह ख़ुदा की तरफ़ से भेजे गए हैं और उस के नुमाइंदे हैं और जो कुछ येह हज़रात फ़रमा रहे हैं सब ह़क़ और ह़क़ीक़त है ताकि लोग आसूदा ख़ातिर हो कर उनके अहकाम सुनें, उन पर ईमान लाएँ और अपनी अमली ज़िंदगी में उनकी बातों पर अमल करें।

 

मोअ्‌जेज़ा क्या है

मोअ्‌जेज़ा य़अ्‌नी वोह काम जिसे अम्बिया अलैहिमुस्सलाम अपने दअ्‌वाए नबूवत के सुबूत में इरादा और मशीयते ख़ुदावंदी से अंजाम देते हैं जब कि दूसरे लोग इस काम की अंजाम देही से बिल्कुल क़ासिर हैं।

 

मोअ्‌जेज़ा सिर्फ़ सुबूते रेसालत के लिए

बअ्‌ज़ बहाना के मुतलाशी लोग अपने ज़ाती एनाद और अदावत की बेना पर न कि सुबूते रेसालत के लिए बल्कि अम्बिया से प़र्खाश (लड़ाई) की बेना पर उनसे इस बात का मुतालबा करते थे कि वोह फ़ुलाँ फ़ुलाँ काम अंजाम दें और बसा औक़ात तो ऐसी चीज़ों का सवाल करते थे जो अक़्ली तौर पर मु़हाल हैं लेकिन अम्बिया अलैहिमुस्सलाम ने अपनी नबूवत के इस्बात के लिए बकसरत मोअ्‌जेज़ात पेश किए थे जिसकी बेना पर वोह उन लोगों के मुतालबात का कोई जवाब न देते थे और उन्हें येह बात समझा देते थे कि हमारा मक़सद अफरादे बशर की हेदायत है और उन्हें उनके अंजाम से डराना है और बअ्‌ज़ ज़रूरी मवाक़ेअ्‌ पर मशीयत और इरादए ख़ुदावंदी से मोअ्‌जेज़ात भी पेश करते थे।

क़ुरआन ह़कीम ऐसे अफराद के जवाब में इर्शाद फ़रमाता हैः

قُلْ اِنَّمَا الْآیَاتُ عِنْدَاللہِ وَاِنَّمَا اَنَا نَذِیْرٌ مُّبِیْنٌ۔

क़ुल इन्नमल आयातो इन्दल्लाहे व इन्नमा अना नज़ीरुम मुबीन

(सूरए अन्कबूत, आयत ५०)

‘‘में तो सिर्फ़ एक डराने वाला हूँ। तमाम निशानियाँ ख़ुदा के पास हैं।’’

क़ुरआन एक जगह और इर्शाद फ़रमाता हैः

وَمَا کَانَ لِرَسُوْلٍ اَنْ یَّاتِیَ بِاٰیَۃٍ اِلَّا بِاِذْنِ اللہِ۔

व मा का-न ले-रसूलिन अन याते-य बेआयतिन इल्ला बेइज़्निल्लाहे

(सूरए मोअ्‌मिन, आयत ७८)

‘‘किसी नबी को येह ह़क़ ह़ासिल नहीं है कि वोह बगैर इ़ज्ने ख़ुदा के कोई निशानी (मोअ्‌जेज़ा) पेश करे।’’

 

सबक़ १६: इस्मते अम्बिया (अ.स.)

ख़ुदावंद ह़कीम और मेह्रबान ने अम्बिया मब़्ऊस फ़रमाए ताकि उनकी रहबरी में कारवाने बशरीयत सही़ह राह पर गामज़न रहे और ज़लालत की वादियों में न भटके। मे़अ्‌राजे कमाल-ओ-इतेक़ा की आख़िरी मंज़िल तक पहुँच जाए और अपने को इन्सानी सिफ़ात और अख़्लाक़ी आदात से आरास्ता करे।

इसी बेना पर ख़ुदावंद ह़कीम और मेह्रबान ने अपने तमाम अम्बिया को हर क़िस्म की ख़ता और इश्तेबाह और गुनाह से महफ़ूज़ और मअ्‌सूम रखा ताकि ज़िंदगी के हर शोअ्‌बे में इन्सान की सही़ह और कामिल रहनुमाई कर सकें और उनमें अहकाम ख़ुदा की एताअत और फ़रमाँबर्दारी का ज़ज्बा कूट कूट कर भर दें और उन्हें इधर उधर भटकने से महफ़ूज़ रखें।

वोह दलील जो ज़रूरते अम्बिया के ज़ैल में बयान की गई है, वही दलील अम्बिया के लिए इस्मत को ज़रूरी क़रार देती है। इन्सानियत की रहबरी के लिए अम्बिया का मअ्‌सूम होना नेहायत ही ज़रूरी है। क्योंकि बे़अ्‌सते अम्बिया की ग़र्ज़ और मक़सद इन्सान की तरबियत और कारवाने बशरीयत की हेदायत की तरफ़ रहनुमाई है। येह मक़सद सिर्फ़ इस्मते अम्बिया के साए में ह़ासिल होता है। येह बात बदीही (वाज़ेह) है कि गुनाह, ख़ता, इश्तेबाह, बेमक़्सद उमूर, इन तमाम चीज़ों का अंजाम येह है कि लोग मुतनि़प़फर हो जाएँगे और उनका एअ्‌तेमाद उठ जाएगा और इस तरह़ मक़सदे बे़अ्‌सत फ़ौत हो जाएगा और लोगों की हेदायत और तरबियत न हो पाएगी।

येह बात सभी जानते हैं कि कोई भी अक़्लमंद अपने मक़सद-ओ-ह़दफ़ को बेकार नहीं करता है। बतौरे मिसाल एक शख़्स की ख़ाहिश है कि उस की महफ़िल-ओ-जश्न में मोअज़्ज़ज़ और मोहतरम हस्तियाँ शिरकत करें, उसे इस बात का भी इल्म है कि येह शख्सीयतें उस वव़त तक तश्रीफ़ नहीं लाएँगी जब तक उन्हें बाक़ा़एदा दअ्‌वत न दी जाए। इन लोगों को दअ्‌वत देने के लिए वोह कभी भी ऐसे शख़्स को मुंतख़ब नहीं करेगा जिसको देखते ही लोग मुतनि़प़फर हो जाएँ, बल्कि वोह ऐसे शख़्स को तलाश करेगा जो उन लोगों के ऩज्दीक मोहतरम और क़ाबिले एअ्‌तेमाद हो। अगर उस के अलावा कोई और सूरत इख़्तेयार की तो कोई भी उस के फ़ेअ्‌ल को आक़िलाना न कहेगा और न उस शख़्स को अक़्लमंद कहेगा बल्कि सब उस की मज़म्मत ही करेंगे।

ख़ुदावंद ह़कीम और मेह्रबान ने उन तमाम चीज़ों का ले़हाज़ रखा है जो इन्सान की हेदायत और तरबियत में मोअस्सर हैं। ख़ुदावंद आलम ने कभी येह न चाहा कि इन्सान हवा-ओ-हवस का पैरव रहे और हवस रानों का आलए कार बना रहे। जिसकी बेना पर वोह अपने इरतेक़ाई सफ़र को तै न कर सके और अपनी ज़िंदगी को कामिल न बना सके।

ख़ुदावंद आलम ने मअ्‌सूम अम्बिया को भेजा ताकि लोगों की हेदायत करें और बेहतरीन तरीके पर उनकी तरबियत करें।

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम का मअ्‌सूम होना क्यों ज़रूरी है? एक ज़रा तफ़सीली जाएज़ा लेते हैं।

तरबियत

गुज़श्ता दर्स में येह बात पढ़ चुके हैं कि बे़अ्‌सते अम्बिया की ग़र्ज़ इन्सान की तअ्‌लीम-ओ-तर्बियत है। येह बात बदीही (वाज़ेह)है कि तरबियत में मु़अल्लिम और मुरब्बी का अमली किरदार उस के क़ौल से कहीं ज़्यादा मोअस्सर होता है।

मुरब्बी (तरबियत करने वाला) के किरदार में येह असर है कि वोह लोगों में एक बुनियादी इन्क़ेलाब पैदा कर सकता है। तरबियत के उसूल में येह बात क़तई है कि इन्सान ऩपसीयाती तौर पर मुरब्बी के अख़्लाक़-ओ-किरदार, आदात-ओ-अत्वार को अपनाने की कोशिश करता है और इतना ज़्यादा उस का हम-रंग हो जाता है जिस तरह़ साफ़-ओ-शपफ़ाफ़ पानी में आसमान का अक्स। येह पानी भी आसमानी रंग का मअ्‌लूम होता है।

सिर्फ़ गुफतार में येह सलाह़ियत नहीं है कि वोह सही़ह तौर पर तरबियत कर सके। बल्कि तरबियत (जो कि मक़सदे बे़अ्‌सत है) के लिए ज़रूरी है कि अम्बिया अलैहिमुस्सलाम ऐसे सिफ़ात-ओ-आदात से आरास्ता हों जिसमें किसी क़िस्म के शक-ओ-शुब्हे की गुंजाइश न हो और उनसे ख़ता-ओ-लग्ज़िश का भी इम्कान न हो, ताकि कामियाबी से इन्सान की तरबियत कर सकें और एक मुक़द्दस मक़सद की तरफ़ उस की सलाह़ियतों को जज़्ब कर सकें।

येह वाज़ेह है कि जो ख़ुद गुनाहगार होगा ख़ाह उसने गुनाह का इतेकाब कितनी ही तन्हाई में किया हो किसी को इस की ख़बर तक न हुई हो और येह शख़्स अपने को लोगों के सामने कितना ही ज़्यादा पार्सा-ओ-पाकीज़ा ज़ाहिर करे, ऐसे शख़्स में हरगिज़ वोह रू़ही इस्तेक़ामत और मअ्‌नवी सबात न होगा जिसकी बेना पर इन्सानों में बुनियादी और रू़ही इन्क़ेलाब ला सके।

जो शख़्स ख़ुद शराब ख़ार है वोह दूसरों को शराब ख़ारी से क्यूँकर रोकेगा, और क्यूँकर इस लत (ख़सलत) से बरसरे पैकार होगा।

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